Friday, 13 January 2012

गीता और प्रजातांत्रिक व्यवस्था

राजतान्त्रिक व्यवस्था में जैसा राजा होगा, वैसी ही प्रजा होगी, राष्ट्र
होगा, सारी व्यवस्थाएं होगीं.
प्रजातान्त्रिक व्यवस्थामें जैसी प्रजा होगी, वैसा ही राजा होगा, सारी
व्यवस्थाएं होगीं.
हमें इस बात को बार-बार ध्यान में रखना होगा कि वह कल जिसमे श्रीगीता का अवतरण हुआ,
उस काल में राजतान्त्रिक व्यवस्था थी,
और आज हमलोग प्रजातान्त्रिक व्यवस्थामें जीने वाले, के सहभागी मनुष्य हैं.
" घृतराष्ट्र बोले, आगे पढ़ें http://sribhagwatgeeta.blogspot.com

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Thursday, 12 January 2012

'घृतराष्ट्र' शब्द का अर्थ

'घृतराष्ट्र' यह शब्द देखिये.
पुराणों की कथाओं में इनके रचियता श्रीवेदव्यासजी ने मुख्य-मुख्य पात्रों
के नाम बङे सार्थक दिए हैं.
मैं यह नहीं समझता की सारे नाम काल्पनिक है, लेकिन इश्वरकृपा से सार्थक अवश्य है.
'घृतराष्ट्र'- क्या करेंगे आप इस शब्द का अर्थ- यही न कि दोषों,
बुराइयों, गुस्ताखियों,
अज्ञानयुक्त कर्मो और व्यवस्थाओं वाला राष्ट्र! आगे पढ़ें
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Monday, 9 January 2012

!!श्रीमभ्दगवग्दीता, अध्याय:०१/श्लोक:०१/पोस्ट:०२!!

!!श्रीमभ्दगवग्दीता, अध्याय:०१/श्लोक:०१/पोस्ट:०२!!
!!ॐ नमो भगवते!!
*
घृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समावेता युयुत्सवः!
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय!!१!!
घृतराष्ट्र बोले, हे सञ्जय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में इकट्ठे हुए युद्ध
की इच्छा रखने वाले मेरे और पांडुके पुत्रों ने क्या किया?!!१!!
उपरोक्त श्लोक 'अर्जुन विषद योग' (प्रथम अध्याय: श्रीमभ्दगवग्दीता) का है.
" श्रीमभ्दगवग्दीता: मेरीसमझ में " नामक लिखी जाने वाली इस कृति के कर्ता
स्वमं भगवान शीकृष्ण हैं.
मुझ विमूढ़ में ऐसी कोई प्रज्ञा या सामर्थ्य नहींकी 'श्रीमभ्दगवग्दीता' के
एक श्लोक को भी समझ सकूँ.
परमपुरुष, परमात्मा भगवन श्रीकृष्ण ही अनुप्रेरित करते है, सब कुछ अनुकूल बनाते है,
और व्यक्त होने की कृपा करते है मुझ तुच्छ की लेखनी के माध्यम से.
इस कृति में मैं 'श्रीगीता' के मूल श्लोकोंएवं टीकाओं को
गीताप्रेस, गोरखपुर के द्वारा प्रकाशित " पद्मपुराणान्तर्गत प्रत्येक
अध्याय के महामत्य्मसहितः श्रीमभ्दगवग्दीताः १६ " से ले-लेकर आपकी सेवा
में प्रस्तुत कर रहा हूँ.
मैं गीताप्रेस, गोरखपुर(प्रकाशक एवं मुद्रक) का आभारी हूँ.
उनका वेबसाइट है www.gitapress.org
विषाद मानवता है, विषादमुक्त देवता है, विषादहीन पशुता है.
अर्जुन विषादयुक्त हो जाते हैं, श्रीकृष्ण सर्वथा विषादमुक्त हैं,
और युद्धक्षॅत्र में आयेशेष सारे कौरवों, पांडवोंतथा उनकी सेनाओ के मनों
में कोई विषाद नहीं!
यह एक स्पस्ट स्थिति है, मानसिक अवस्था है- इस वक्त युद्धभूमि में
उपस्थित सभी मनुष्यों की. आगे पढ़ें http://sribhagwatgeeta.blogspot.com

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Saturday, 7 January 2012

हर काल में परमात्मा गीता गाता है

परमात्मा हर काल में, हर युग में, हर अर्जुन के समक्ष अपने संपूर्ण रूप
में, विराट रूप में प्रकट होता है,
गीत गाता है, गीता को प्रकट करताहै, महाज्ञान को प्रकट करता है,
आत्मज्ञान को, प्रमात्मज्ञान कोअभिव्यक्त करता है.
यहीं श्रीकृष्ण के द्वारा उपरोक्त घोषणा में श्रीकृष्ण के कहने के भाव
हैं- मेरी समझ से। पूर्ण पढ़ें अमृताकाशी की समझ को श्रीगीता पर, यहाँ
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Friday, 6 January 2012

गीता परम अस्तित्व का ज्ञानावतरण है

गीता हर काल के, हर जाति के, हर वंश, गोत्र, धर्म, सम्प्रदाय, संघ के
मनुष्यों के लिए आत्मा सदृश्य अमृत है, अनैश्वेर है, शास्वत है.
गीता में श्रीक्रष्ण अपने सखा, शिष्य, प्रिय अर्जुन को कहते हैं-
"हे अर्जुन! जो ज्ञान मैनें सृष्टि के आरम्भ में सूर्य को कही थी, वही
ज्ञान, वही परमज्ञान आज तुझे मैं कह रहा हूँ." – यह घोषणा उस शरीर नाम से
जाने जाने वाले कृष्ण, जिस शरीर के जनक वसुदेवजी हें, जननी देवकीजी हैं-
उस शरीर की यह घोषणा नहीं है.
यह घोषणा करने वाला परमात्मा (परम् आत्मा) हैं , ईश्वर हैं , सर्वेश्वर
हैं, परमेश्वर हैं,
या किसी नाम से जाना जाने वाला, किसी धर्म के अनुआयियों द्वारा माना या
जाना जाने वाला-
सर्वव्यापी, सर्वकालीन, सर्वज्ञ, सर्वातीत, सर्वलिप्त, सर्वालिप्त- परम
अस्तित्व की है, अनंत अस्तित्व की है।
यह घोषणा उसी अनंत परम् अस्तित्व की है कि:
"सृष्टि के आरंभ में मैंने जो ज्ञान सूर्य को कही थी वही ज्ञान हे
अर्जुन! उसी ज्ञान को मैं आज तुझसे कह रहा हूँ." यह कहना, यह घोषणा विराट
परम् अस्तित्व की है
जो पूर्ण रूप में वसुदेवजी के पुत्र श्रीकृष्णजी के मुखारविंद से की जा
रही है। और आगे पढ़ें http://sribhagwatgeeta.blogspot.com

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Thursday, 5 January 2012

गीता: हर काल, जाति, वंश, धर्म के मनुष्यों के लिए...

यह हर काल के, हर जाति के, हर वंश,गोत्र, धर्म, सम्प्रदाय, संघ के
मनुष्यों के लिए आत्मा सदृश्य अमृत है, अनैश्वेर है, शास्वत है.
गीता में श्रीक्रष्ण अपने सखा, शिष्य, प्रिय अर्जुन को कहते हैं-
"हे अर्जुन! जो ज्ञान मैनें सृष्टि के आरम्भ में सूर्य को कही थी, वही
ज्ञान, वही परमज्ञान आज तुझे मैं कह रहा हूँ." – यह घोषणा उस शरीर नाम से
जाने जाने वाले कृष्ण, जिस शरीर के जनक वसुदेवजी हें, जननी देवकीजी हैं-
उस शरीर की यह घोषणा नहीं है.
यह घोषणा करने वाला परमात्मा (परम् आत्मा) हैं , ईश्वर हैं , सर्वेश्वर
हैं, परमेश्वर हैं,
या किसी नाम से जाना जाने वाला, किसी धर्म के अनुआयियों द्वारा माना या
जाना जाने वाला-
सर्वव्यापी, सर्वकालीन, सर्वज्ञ, सर्वातीत, सर्वलिप्त, सर्वालिप्त- परम
अस्तित्व की है, अनंत अस्तित्व की है. आगे और पढ़ें:
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Wednesday, 4 January 2012

॥परम पुनीता : भगवत गीता॥

परमगीत पुनीता: भगवत गीता!
गीता: महागीत है, महासंगीत है. ज्ञानगीत है, अध्यात्मगीत है.
गीता कोई कथा-कहानी जैसी नहीं है. गीता विशुद्ध ज्ञान है, सत्य-ज्ञान है.
सर्वोपयोगी, सर्वोत्कृष्ट है, ज्ञान का महासागर है गीता. आगे पढ़ें -
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